कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥
महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।